Saturday, May 28, 2011

होराम्बो लौज



विद लव फ्रॉम किलिमंजारो !
होराम्बो लॉज! तंज़ानिया के किलिमंजारो प्रांत के मोशी शहर के एक किनारे पर बना एक छोटा सा होटल लॉज जहाँ लिलियन काम करती है और मोशी- किलिमंजारो और लिलियन का घर! यहाँ मुझे मिले जीवन के दो अनुभव जो कहीं मेरे अंतस में गहरे जा बैठे हैं.
किलिमंजारो ज्वालामुखी विश्व का सबसे ऊँचा अकेला पहाड़ (टालेस्ट स्टैंड अलोन माउन्ट ) --स्वाहिली भाषा में इसका मतलब है चमकता पहाड़ ( किलिमा= पहाड़; नजरो= चमकदार) और यह है तंज़ानिया की पहचान जिसे देखने दुनिया भर से लाखों सैलानी हर साल आते हैं। जिसकी सबसे ऊँची चोटी ५८९५ मीटर है! हालाँकि माउन्ट एवरेस्ट की तुलना में और गणित के पैमाने पर आप कह सकते हैं कि हिमालय की दर्जनों चोटियाँ इससे ऊँची हैं पर यकीन मानिए ..अपनी आँख के सामने आकाश में लगभग ६ कि मी ऊपर उठे एक अकेले खूबसूरत पाइन के पेड़ जैसे पहाड़ का नज़ारा ...मेरे लिए इससे ज्यादा सुन्दर और खुशनुमा कुछ नहीं रहा!
" नाऊ यू कैन सी माउन्ट किलिमंजारो ऑन यौर राईट साइड" - इस उद्घोषणा के साथ ही जहाज के मुसाफिरों में जो हलचल होनी शुरू होती है वोह भी एक नज़ारा होता है. हर कोई अपना कैमरा लेकर इस कोशिश में की एक फोटो मिल जाए.. जहाज का सारा वजन मानो एक तरफ आ जुटता है. जमीन से देखने में तो बहुधा बादलों के कारण चोटी नहीं दिखाई पड़ती पर जहाज से अक्सर चोटी के दर्शन हो जाते हैं इसलिए मुसाफिर यह अवसर छोड़ते नहीं!.

साल दर साल उड़ते जहाज की खिड़की से इसे देखने का मजा में लेता रहा हूँ और इसके क्रेटेर और ग्लेशियर के फोटो भी लेता रहा था इस सपने के साथ कि कभी तो आमना सामना होगा लेकिन जब अचानक किलिमंजारो से मेरा सामना हुआ...
ईस्ट अफ्रीकन कम्युनिटी के मंत्रालय में कुछ काम से मैं अरुषा शहर आया था और अगले दिन मोशी में एक दिन कुछ मीटिंग जिन्हें ख़त्म करके अगले दिन सुबह मुझे ७ बजे दर एस सलाम की फ्लाईट लेनी थी सो में ३.०० बजे काम खतम करके शहर के दूसरे कोने में प्रेसिसन एयर के ऑफिस पहुंचा और मालूम हुआ की वहीँ से सुबह एयर पोर्ट की शटल ६.१५ को मिलेगी सो में जा पहुंचा होराम्बो लौज जो ठीक सामने था और चेक इन कर मेरे तीसरे फ्लोर के कमरे से कॉफ़ी का कप हाथ में लिए में बरामदे में आ खड़ा हुआ.

बाहर मैदान जो मीलों तक खतम होता नहीं दीख रहा था उसके दूसरे छोर को देखने के प्रयास में जो दिखा तो में स्तब्ध सा रह गया था. मेरे ठीक सामने जमीन से लेकर मीलों ऊपर आकाश में चमकते अग्नि स्तम्भ सा किलिमंजारो खड़ा था. इतना स्पष्ट , इतना भव्य और मैं अवाक् , रोंगटे खड़े और आँखे विस्फारित सी लिए जैसे सम्मोहन में था. उस दिन किलिमा मेरे साथ किंचित वार्ता की मुद्रा में था बहुत ही मेहरबान और लगभग आधे घंटे तक डूबते सूरज की किरणों में चमकती चोटी जैसे मेरी वर्षों की इच्छा को पूरा कर रही थी. मैने बचपन से सुना था की पेड़ और पहाड़ दिल की बात सुनते हैं और उस दिन इस सच को घटित होते देखा.

लिलियन से मेरी मुलाकात - होराम्बो लोज में हुई ....मै किलिमंजारो से अपनी बातचीत ख़त्म करके जल्दी खाने के लिए डाइनिंग हॉल में जा बैठा ..एक तो मैं शाकाहारी ब्रह्मण दूसरे तंज़ानिया में तो हर जगह गाय ही काटके परोसी जाती है तो छोटी जगहों पर बहुधा खाने की समस्या बनी ही रहती है सो वेटर को समझाने का असफल प्रयास कर रहा था कि मुझे क्या चाहिए कि लिलियन आ धमकी लगभग १९-२० साल की लड़की जो वहां काम करती है. -छोटा सा होटल सो रेसप्शिओं और अकाउंट दोनों ही देख लेती है...भीड़ भाड़ नहीं तो कुछ खास काम भी नहीं सो फुर्सत में थी. वेटर के साथ मेरी समस्या का समाधान करके मेरे जैसे नए प्राणी को देख बात करने बैठ गयी.

यू आर वैरी हैण्डसम मि. पन्त! मेरे कान खड़े हुए..आखिर ये स्वेछाचारिणी बाला कहना क्या चाहती है. पुरुष का अहम् ..अपने तमाम श्वेत केशों के बाद भी अपने चिरस्थायी केशोर्य का गुमान जाता कहाँ है! पर यहाँ के खुले आचरण के परिदृश्य में ये कोई अनहोनी जैसी बात थी भी नहीं ऐसे में मेरा सोच स्वाभाविक ही था पर मेरा डर दूर हो गया जैसे ही उसने कहा " आई वांट तो मेरी यौर सन, ही मस्ट बी हैण्डसम लाइक यू.. और में ठठाकर हंस पड़ा.." यू विल हैव टु वेट फॉर १५ मोर यीर्स ..ही इस ओनली ६."
छोटे कस्बों में रहने वाले लोग वैसे भी बातचीत और व्यवहार में खुले ही होते हैं सो सिलसिले में पता चला की किलिमंजारो के किसी कबीले के मुखिया की बेटी है..दसवीं तक पढ़ चुकी है और आगे की सोच रही है..पास में बैठी दूसरी लड़की को दिखा कर बोली की वोह उसकी सौतेली बहिन है आयेशा..उसके पिता की दूसरी पत्नी की बेटी! मैं थोडा चौंका..लिलियन और आयेशा..हाँ, माय मदर इज क्रिस्टियन एंड हर मदर इस मुस्लिम. ओह एंड यौर फादर? ही डस नॉट फ़ॉलो एनी रेलिजेन!
पता चला कि घर में २० लोग साथ रहते हैं और हर कोई अपने हिसाब से चर्च, मस्जिद जाता है और कोई प्रतिबन्ध नहीं है!

मुझे याद है कुछ साल पहले ज़न्ज़ीबार के एक हनुमान मंदिर में अँधेरे गर्भ गृह में पूजा करते समय मुझे अचानक दो बहुत ही गोरे खूबसूरत से हाथ हवा में तैरते हुए नज़र आये और उनसे कुछ फूल गिरे. में चौक गया कि यह हनुमान मंदिर में भूतनी कैसे फिर कनखियों से देखा तो समझ पाया के काले बुर्के से बाहर निकले थे और अंधरे के कारण बस हाथ ही दिखे....जंजीबार में ९०-९५% आबादी मुस्लिम है इसलिए हिन्दू मुस्लिम विवाह हो जाते हैं पर विवाह के बाद भी अपनी धार्मिक मान्यताएं पालन कि छूट होती है! इतना है की विवाह के समय यह तय कर लेना होता है कि अंतिम संस्कार अग्नि से होगा या फिर...
जब इसके सामने अपने देश के धार्मिक और सामाजिक परिदृश्य को देखता हूँ तो समझ नहीं पाता कि जीवन को आसान बनाने का प्रयास हम क्यों नहीं करते..आखिर मान्यताएं मनुष्य के लिए बनी हैं न कि मनुष्य मान्यताओं के लिए!

ऑनर किल्लिंग्स, ब्राइड बर्निग्स, जाति धर्म , भाषा इन सबके नाम पर हम अपने जीवन को क्या बना रहे हैं और क्या कुछ खो दे रहे हैं इसको समझाने का प्रयास शुरू कर देने के लिए अभी भी शायद देर नहीं हुई लेकिन गंगा की धारा और किलिमा के ग्लेशियर सदा नहीं रहेंगे .. जीवन के ये स्रोत खो जाएँ इसके पहले ही हमें कुछ करना होगा!
अन्वेषक

Saturday, February 19, 2011

Meri Shiksha Yaatra jaari

गतांक (2) से आगे...

मेरी शिक्षा यात्रा.....

1980-राजकोट, गुजरात प्रान्त के काठियावाड़ प्रदेश में बसा एक शांत छोटा शहर, एक अलग संस्कृति, अलग परिवेश. दिल्ली के उजड्ड (क्षमा प्रार्थना सहित) और भागमभाग भरे माहौल से बिलकुल अलग जहाँ भोजन की मिठास की तरह बातचीत और हावभाव में भी शक्कर की अतिरिक्त मात्रा का अनुभव सहज ही हो जाता था और हर प्रक्रिया धीरे धीरे ... 'स्लो मोशन" चलचित्र की तरह!

कालावाड रोड पर हमारा स्कूल शहर से बाहर निर्जन में था, बिलकुल रेतीली जमीन और तरह तरह के सरीसृप जिनमें सांप और गोह भी शामिल थीं हमें मिलने चले आते थे. ये एक अलग ही दुनिया थी.
पूरे परिवेश की तरह विद्यालय का माहौल भी शांत और सादगी से भरा था. अधिकतर शिक्षक केम्पस में बने आवासों में ही रहते थे तो उनकी जीवनशैली दिल्ली के शिक्षकों की तुलना में तनाव रहित ही थी और स्वाभाविक ही वोह उनके व्यवहार में दीख पड़ती थी.
हालांकि इस अंतर और इससे जुड़े नतीजे यानी शिक्षकों के छात्रों के साथ व्यवहार को समझने में मुझे कई वर्ष लग गए जब मैंने मानवीय मनोविज्ञान को पढने का प्रयास किया..नतीजतन मेरी अपने कुछ शिक्षकों से जुडी कुछ शिकायतें जो मेरे अंतस में कहीं दबी पड़ीं थीं, में उनसे मुक्त हो पाया. विशेष कर महिला शिक्षकों के प्रति मेरे मन में एक विशेष सम्मान का भाव भी आ जुड़ा जब मुझे यह बात समझ में आई कि सुबह उठकर घर का सब काम, फिर १०-२० कि. मी. की दौड़, पूरा दिन काम, फिर दौड़ और फिर घर का काम, साल के ३०० दिन..ऐसे में किसी भी सामान्य मनुष्य का तनावग्रस्त होना और कभी नाराज़ हो जाना स्वाभाविक ही है. किंचित एक वय विशेष में यह समझ पाना नितांत दुरूह होता है और सपनों के रंगीन चश्मों से दुनिया बस सतरंगी ही नज़र आती है, उसमें श्याम और श्वेत का स्थान ही कहाँ होता है!

जिन शिक्षकों ने राजकोट में मुझ पर सबसे अधिक प्रभाव डाला वो थे श्री पन्नालाल शर्मा, और श्री तिवारी-
पन्नालालजी हमारे कक्षा अध्यापक थे और हिंदी पढ़ाते थे. मैंने अपनी कक्षा के लिए उनसे अधिक मेहनत करते हुए किसी को नहीं देखा. उनकी लिखावट इतनी सुन्दर थी कि ऐसा लगता था जैसे टाइप प्रिंट किया गया है. कक्षा के डिस्प्ले बोर्ड पर उनके बनाये गए चार्ट्स की बदौलत हमारी कक्षा को सर्वश्रेष्ठ कक्षा का खिताब हासिल था. एक दिन हमारे प्रधानाध्यापक महोदय कक्षा के दौरान सर्वेक्षण में आ बैठे. पन्नालालजी की स्थिति ऐसी थी जैसे कोई प्राइमेरी का बच्चा पहली बार अस्सेम्ब्ली में भाषण दे रहा हो. वो घबराहट में शब्द भूल से जा रहे थे. उस समय संधि पर वार्ता हो रही थी और उसे समझाने के प्रयत्न में पन्नालालजी ने कहा हाइड्रोजन और ओक्सीजन मिलकर जैसे एचओटू बनता है वैसे ही संधि....और मुझ सहित कक्षा के बहुत से ज्ञानी बच्चे उनके केमिस्ट्री ज्ञान पर हंसने लगे थे, आज सोचता हूँ की हम सब कितने मूर्ख थे कि उनके इस प्रयास को समझने और उसका सम्मान करने के बदले हम उपहास प्रवीण बन बैठे. सच ही विवेक बुद्धि के अभाव में मनुष्य चाँद की जगह पर चाँद दिखाने वाली ऊँगली को ही पकड़ और उसकी विवेचना कर अपनी समझ को सार्थक मान बैठता है. छात्रों का उत्साहवर्धन करने में भी वोह कभी कृपणता नहीं करते थे.

मुझे याद है प्री बोर्ड में मैंने मदर टेरेसा पर निबंध लिखा था जिसमें तथ्यगत सूचनाएं जैसे उनका जन्म स्थान, जन्म तिथि आदि नहीं थीं जो सामन्यतः निबंध के लिए आवश्यक मानी जाती हैं पर मैंने निबंध की शुरुआत कुछ इस तरह की थी-
" श्वेत वस्त्रों में लिपटी, गौर वर्ण दुबली पतली सी कृशकाय महिला, जिसकी आँखों में करूणा और हर कृत्य में परमार्थ दीख पड़ता है, कौन है यह? निर्मल सदन के प्रांगण...."
और पन्नालालजी इस पर मुग्ध हो गए थे...बारम्बार उनकी हर कक्षा में उन्होंने इन पंक्तियों को पढ़ कर सुनाया और मेरे निबंध के अन्य तमाम अभाव और न्यूनताओं के उपरान्त भी मुझे केवल इस प्रारंभ और अंत (जो मुझे याद नहीं पड़ता) के दम पर ही २० में से १८ अंक मिल गए थे.

तिवारी सर बायोलोजी पढ़ाते थे और उनके जैसी ड्राईंग मैंने आज तक किसी को बनाते नहीं देखा. हर क्लास के पहले बायोलोजी लैब में सम्बंधित विषय की ड्राइंग - फ़्रोग के आर्तीरिअल सिस्टम, मस्कुलर सिस्टम, वेनस सिस्टम या केवल हार्ट- भांति भांति के रंगों की चॉक्स से श्याम पट की शोभा बढाती दीखती थीं. आजीवन अविवाहित और एकाकी , सेवानिवृत्ति की और अग्रसर तिवारी सर के जीवन में किंचित छात्रों और विद्यालय के सिवा और कोई शगल था ही नहीं और अपने जीवन के सब रंगों की कमी वो श्याम पट पर रंग बिखेर कर पूरी कर लेते थे. हर एक नयी क्लास और एक नयी ड्राइंग!

अपनी गणित और विज्ञान की बहुत सी मूलभूत कमियों को में राजकोट में दूर कर पाया हालाँकि बोर्ड की परीक्षा में अपनी ध्यान न देने की सबसे बड़ी कमी के कारण अंक फिर से वोही ढाक के तीन पात पर साइंसमें दाखिला मिल जाने पुरते अंक मिल गए! इधर कक्षा ११ कि शुरुआत हुई और पिताश्री के स्थानान्तरण का आदेश भी और पथिक पुनः दिल्ली कि ओर प्रस्थित.
मुझे आज भी याद है कि राजकोट से वापस आकर दिल्ली के अपने पुराने विद्यालय ( टेगोर गार्डेन) में कक्षा ११ में पुनः दाखिले के लिए पहुंचा तो कक्षा ९ कि अध्यापिका श्रीमती मेहता मिल गयीं और बहुत खुश होकर उन्होंने कहा अरे वाह साइंस मिल गयी. पूरे एक साल मुझसे कक्षा ९ में त्रस्त और मेरी डायरी और नोटबुक दोनों को लाल स्याही से भर कर साइंस नहीं मिलेगी कि उद्घोषणा करने वाली शिक्षिका मेरी सफलता से बड़ी प्रसन्न थी! आज सोचता हूँ तो हंसी भी आती है पर उन दिनों ढर्रा कुछ ऐसा था की विज्ञान माने वैशिष्ट्य ( सबसे बुद्धिमान); कॉमर्स ( दूसरी श्रेणी) और आर्ट्स वाले- माने जिनका कुछ नहीं हो सकता!
पर जो भी हो नियति को मेरी उपस्थिति उस तथाकथित विशिष्ट वर्ग में रखनी थी किंचित इसीलिए राजकोट यात्रा हुई अन्यथा दिल्ली के स्कूल में तो मेरे अंकों के साथ विज्ञान में प्रवेश असंभव था सो अपनी यात्रा बढ़ चली!
क्रमश.......

Sunday, March 14, 2010

Vikaas ki paribhaasha?

शिक्षक महोदय डार्विन पढ़ा रहे थे,
अन्य प्राणियों से हम विकसित हैं,
कैसे, यह बता रहे थे.
मनुष्य के पास है भाषा उन्नत,
वह औजार बना सकता है,
सीधी रीढ़ कर चलता है,
भविष्य के विचार बना सकता है.

मुझ पशु प्रेमी की शंका जागी,
तर्कबुद्धि कुछ आगे भागी...
भाषा है संवाद का माध्यम,
पर ये बनी विवाद का साधन,
कटुता द्वेष प्रसार का माध्यम,
इतरों के उपहास का साधन.

औजार बनाने की क्षमता ने,
बना लिए इतने हथियार,
अनसुनी कर करुण पुकार,
मनुष्यता पर कर प्रहार,
कर सकते सृष्टि संहार.

भविष्य पर विचार की क्षमता ने,
उदार मन को भ्रष्ट किया,
औरों से छीन संचय की
क्षुद्र वृति को पुष्ट किया,
आनंद त्याग आज का,
कल की चिंता को संपुष्ट किया.

सीधी रीढ़ ही केवल एक
विकास का कारण दिखती है,
लाभ किंचित दिखे जहाँ,
तुरत वहां झुकती है.

हम हैं विकसित और हैं सभ्य,
नहीं मानता मेरा मन,
प्रार्थित है, शंका निवारण ,
उत्तर दें हे प्रज्ञजन!

अन्वेषक

Meri Shikshaa Yaatra (2)

गतांक से आगे ...

मेरी शिक्षा यात्रा जारी...

तो श्री ललित प्रसाद शर्माजी, हिंदी, सामाजिक विज्ञानं तथा देव भाषा संस्कृत की सम्मिलित कृपा से कक्षा ८ तक तो किसी प्रकार ठीक ठाक काम चल गया और कुल अंक भी अछे ही आ गए. यद्यपि अंग्रेजी भाषा विषय में भी स्थिति बुरी नहीं थी पर इस भाषा माध्यम के प्रयोग के कारण प्रश्न समझ ही नहीं आते थे.

नवीं कक्षा सम्भवतः स्कूल की कठिनतम कक्षा होती है! यहाँ तो सब कुछ ही बदल गया क्योंकि अबतक जो भी सीखा था वह सब तो प्रस्तावना थी, पाठ्य क्रम तो अब आरम्भ हुआ है ऐसा हमें बताया गया और गणित और विज्ञान की पुस्तकें देखकर इस बात का अर्थ समझ आ गया! शिक्षकों के अभाव के कारण हमें नवीं कक्षा में कुछ ऐसे शिक्षकों का सामना करना पड़ा था जो सम्बन्धित विषय से ही नहीं थे...जैसे एक संस्कृत की अध्यापिका अपने विद्यालय के दिनों में पढ़ी गणित के आधार पर हमें गणित, और सामाजिक ज्ञान की एक शिक्षिका हमें हिन्दी के लिए आवंटित हुयीं तो वहाँ मेरे जैसे बौड्म भट्टराय का क्या काम बनता?

किन्चित मैं किसी भी समस्या को हर पहलू से देखे बिना समझ ही नही पाता था. "जैसा बाद में मुझे पता लगा कि मेरे जैसे मानस के लोग "क्युमुलातिव थिन्केर्स" ( cumulative thinkers ) या फिर सामान्य वार्तालाप की भाषा में ट्युब लाइट कहलाते हैं तो स्वाभाविक ही था कि जहाँ सिलेबस को किसी तरह पूरा करने की भागम भाग हो, वहाँ प्राथमिकता, समस्या को समझने या समझाने की नहीं, वरन उसे हल करने की थी भले ही वोह "एम बी डी " की गाइड से रट कर ही सही.. तो स्वाभाविक ही गणित और विज्ञानं में सदा की भांति अपना बेताल फिर से उड़कर पेड़ पर जा लटकता था. इस बेताल पच्चीसी के चलते इन दोनों ही विषयों में मेरे फंडे ( Fundamentals) गड़बड़ा गए जिसका घाटा मुझे बहुत आगे तक उठाना पड़ा.

अस्तु, जो भी हो इस बार शिक्षा स्थान को बृहस्पति कृपा पूर्ण हो कर देख रहे थे और हमें केमिस्ट्री पढ़ाने आयीं श्रीमती सेठ! एक नाम और व्यक्तित्व जिसे भूल पाना शायद किसी भी सम्पर्क में आने वाले के लिए सम्भव नहीं होगा! गोरी चिट्टी, शानदार कद काठी, तीखे नयन नक्श, कंधे तक काटे बाल और शालीन शृंगार वाली हमारी यह नई शिक्षिका मानो मरुभूमि में आई वर्षा कि तरह थी. उस समय में भी उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि आज के समय की चर्चित मोडेल्स भी उनके सामने पानी भरती दीखतीं! लेकिन कहीं भी कोई असहजता नहीं और शालीन व्यक्तित्व कि तरह ही साफ और स्पष्ट सोच. हरएक विषय पर क्यों, क्या, कैसे, कहाँ पर सम्मिलित चर्चा और पहली बार ऐसा हुआ कि कोई शिक्षक उत्तर देने के स्थान पर प्रश्न जगा रहा था! केमिस्ट्री के तमाम कठिन पेंच.... एटोम्स, इलेक्त्रौन्स, केमिकल कोम्पोसिशन, वलेंसी आसान होने लगे और विज्ञान की ज्ञानयात्रा सहजता से आगे बढ़ चली. अब मजा आने लगा था!

एक और चीज़ जिसके लिए श्रीमती सेठ विख्यात थीं वोह थे करारे थप्पड जो सामान्यतया उन योद्धाओं के लिए सुरक्षित होते थे जो परीक्षा में फर्रे और कुंजी जैसे यंत्रों का प्रयोग करते हए पकड़े जाते थे. धूप का चश्मा पहने हुए वोह जिस परीक्षा कक्ष में निरीक्षक होती थीं वहाँ बडे बडे सूरमा भी ऐसे दुस्साहस कम ही करते थे.. काले चश्मे के पीछे से किस ओर उनकी दृष्टि राडार कि भाँती कब क्या देखले किसी को पता नहीं लगता. लेकिन यदा कदा इन् शस्त्रों का प्रयोग कक्षा में धूर्त गणों को रास्ते पर ले आने के लिए भी हो जाता था और ...विश्वनाथ के बेट के बीच से निकले करारे शौट्स के जैसे उन थप्पडौं की गूंज, १५० फुट लम्बे गलियारे के आखिरी कोने तक सबको सुनाइ देती थी!
यह हमारी इस युवा शिक्षिका के व्यक्तित्व का ही कमाल था कि पहली बार ऐसा हुआ कि कक्षा के शठ सम्राट भी ध्यानपूर्वक अध्यवसाय में जुट गए और बहुत से किशोर भावुक हृदय स्वप्नों में भी खोने लगे जो कि उस वय में कदाचित स्वाभाविक ही था!
सुख के दिन अधिक साथ् नहीं रह्ते, इस उक्ति को चरितार्थ करते भगवान बृहस्पति की दृष्टि पुनः वक्र हुई और उन्होने श्रीमती सेठ को पी जी टी बनाकर स्थानान्तरित कर दिया. वोह चली गईं और पीछे छोड गयीं कक्षा में बिताए गए सबसे रुचिकर पलों की स्मृतियाँ, कुछ थप्पडौं की गूंज और कुछ खण्डित कोमल किशोर हृदय! हमारे ज्ञानी घंटाल सह्पाठियों की मानें तो इन् हृदयों में सारे किशोर छात्रों के नहीं थे!

मानसिक वयस्कता / विवेक बुद्धि का वय से सीधा (और कदाचित अन्यथा भी) सम्बन्ध नहीं होता है यह शिक्षा मुझे दो वर्ष के बाद मिली जब मैने हमारी कक्षा में आई अपनी उप मुख्यशिक्षिका के व्यवहार का आँकलन श्रीमती सेठ से किया. ५५ वर्षीया विगतयौवना (इस विशेषण का कारण -पोंड्स की तहों में ढका उनका चेहरा और सद्य विवाहिता की जैसी गहरी लाल लिपस्टिक) इन महोदया ने कक्षा ११ में अपने एकमात्र ४५ मिनट के सत्र में हमारी कक्षा की सर्वश्रेष्ठ छात्रा को एक शायरी ( जो कदाचित उनके मापदण्ड पर उचित नहीं थी) लिखने के लिए न केवल अभद्र शब्दों में लताडा बल्कि उसके माता पिता सहित भरी कक्षा में उसका कुलोध्धार कर दिया बिना यह सोचे की उसके मन पर क्या प्रभाव पड़ेगा! वहीं २५ के लगभग वय की श्रीमती सेठ ने नवीं कक्षा में हमारे एक भावुक सहपाठी से प्रेमपत्र मिलने पर कक्षा में उसका हाथ पकड कर इतने प्यार से उसे समझाया कि सारा अपराधबोध ही समाप्त हो गया!

नवीं कक्षा का सत्र समाप्ति कि ओर था विज्ञान कि कमाई गणित और इस बार हिंदी में भी गवांई. कुल मिला के "पास मार्क्स" पर अभी पट गिरा नहीं था अभी तो बहुत कुछ सीखना बाकी था!

सत्रांत में पिताश्री का स्थानांतरण इस बार गुजरात के राजकोट नगर में हो गया और एक और अध्याय समाप्त और एक नया प्रारंभ...!

आगे के यात्रा पर मिलते हैं क्रमशः...


अन्वेषक

Sunday, July 19, 2009

लगभग १० महीने बाद, तारीख २९ जून, २००९, सुबह १० बजे दार एस सलाम विमान तल से टाऊन में पहुँचा ही था तो याद आया की मोबाइल सिम लेना है। बाज़ार में पहुंचते ही एक पुराना तन्ज़नियन दोस्त मिला - बड़े जोश के साथ उसने हाथ पकड़ा और अपनी भाषा और लहजे में जिस गति से उसने बहुत सी बातें कह डाली मैं थोड़ा चकित सा रह गया. "करिबू मी. रवि वेवे म्तुम्ज़ुरी बवाना, वेवे नि म्विन्गेरेज़ा, म्ज़ुन्गु. यू ट्रीट अस तन्ज़निअन पीपुल विथ रेस्पेक्ट दैट मोस्ट इन्दिअन्स हियर डोंट. ( आपका स्वागत है रवि , आप बहुत अच्छे आदमी हैं आप हिन्दुस्तानी नहीं हैं आप अंग्रेज जैसे हैं, यूरोपियन जैसे हैं- आप तंजानिया के लोगों को आदर देते हैं जो की यहाँ के हिन्दुस्तानी नहीं देते।)

एक बार तो मुझे लगा की उसके हिन्दुस्तानी मालिक ने उसे नौकरी से चलता कर दिया है या सुबह ही प्रसाद में कुछ फटकार मिली है पर ऐसी कोई बात नहीं थी। एक पुराने दोस्त से मिलकर वह अपना दर्द बाँट रहा था. मेरे ड्राईवर , चौकीदार और दुसरे स्थानीय कर्मचारियों की बातचीत में मुझे यह विशेषण मेरे लिए सुनाई दे ते रहते थे। शायद मेर दोस्ताना तरीका और ज़रूरत होने पर जो भी मदद हो सके कर देने का तरीका उन्हें ऐसा सोचने देता हो।

उपनिवेशवाद का इतिहास जो भी रहा हो पर व्यक्तिगत रूप में यूरोप के लोगों का व्यवहार सामाजिक तौर पर हम भारतियों से बेहतर, अपने स्थानीय कर्मचारियों के प्रति अधिक शिष्ट तथा दोस्ताना होता है ऐसा मैंने कई बार पाया है, हालाँकि अपवाद तो हर जगह होते हैं.

अफ्रीका में कई जगहों पर भारतीय मूल के लोगों ने बहुत प्रयास कर अपनी एक जगह बनायी है पर बहुत बार इस विकास की प्रक्रिया में यहाँ के मूल निवासियों के साथ उनका व्यवहार कुछ सीमा तक दुराग्रह पूर्ण ही पाया है। पता नहीं ये काली चमड़ी के प्रति हमारा सहज दुराग्रह है या उपनिवेश वाद का एक और चेहरा और या फिर मानव का सामान्य स्वभाव जिसमे कृतघ्नता का बहुत ही सहज समावेश है- जिसके ऊपर पाँव रख कर हम ऊपर चढ़ते हैं उस सीढ़ी को निम्न मान कर यह समझने की प्रवृत्ति की सीढ़ी का तो काम ही यह है की हमें चढ़ाये और चुप रहे!

अभी विगत दिवसों में ऑस्ट्रेलिया में भारतीय मूल के छात्रों पर हमले के समाचार आते रहे थे जो अभी भी हालाँकि कुछ कमतर मात्र में जारी हैं ..उनकी प्रतिक्रिया में प्रेस में काफी कुछ पढने मिला जिसमे ऐसी ही कई बातें ..बड़े शब्द रंगभेद, उपनिवेश वाद, हिंसक मानसिकता आदि पढने और सुनने में आते रहे! निश्चित रूप से इनमे कई इस सोच के परिणाम रहे होंगे और यह भी इतना ही सच हो सकता है की यह कुछ स्थानीय निवासिओं के डर का नतीजा हो. बहरहाल जो भी हो अन्वेषक निजी तौर पर ऐसा मानता है की जब तक हम अपनी सोच को आत्मकेंद्रित रखेंगे और निज स्वार्थ से हट कर चलने का प्रयास नहीं करेंगे यह घटनाएँ होती रहेंगी .

इस विषय पर मैं आप प्रज्ञावान जनों के विचार जानना चाहूँगा और संभव हो तो मनोविज्ञान की दृष्टि में इसके कारण क्या हैं और क्या इससे ऊपर उठ पाना संभव है.

अपेक्षा सहित

आपका ही

अन्वेषक