Sunday, February 16, 2020

एक अधूरी सी कहानी

कुछ कहानियाँ अधूरी रह जाती हैं, और फिर कभी अचानक उन भूली सी राहों से गुजरते हुए, उन बीते हुए अतीत के पन्नों से फिर कुछ लम्हे मानों आवाज देकर याद दिलाते से लगते हैं कि कुछ,  जो करना था वो नहीं किया, कुछ अधूरा सा अनकहा, कदाचित कर लिया,  कह लिया होता, तो अंतस में कुछ अधिक सहजता होती। ऐसा ही कुछ लगा मुझे पिछले सप्ताह चंडीगढ़ से लुधियाना जाते हुए, राजपुरा आते ही अचानक कुछ बीते पन्ने फड़फड़ा उठे, याद दिलाने, एक कहानी जो लगभग 37 साल पहले अधूरी सी रह गयी! 
दिल्ली सब्जीमंडी से राजपुरा जाते हुए मेरी मुलाकात एक सफेद पग वाले वयोवृद्ध सरदारजी से हुई। पता चला वो भी राजपुरा में रहते थे। 1983- 84 का वातावरण कुछ अजब ही था, सिख समुदाय को लेकरभ्रांतियाँ थीं और  किसी अजनबी को अपने बारे में नहीं बताने की हम बच्चों की घर में विकट ट्रेनिंग थी। हालांकि वो ट्रेनिंग मेरे किसी काम की नहीं रही न ही वो मुझे कभी रास आई। 
बचपन से ही मैं  अकेले लम्बी यात्राएं करता रहा हूँ और सह्यात्रियों से बिंदास बातचीत भी,  सो बातों में मैंने भी दारजी को बताया कि मैं स्कूल में पढ़ता हूँ और अपने ममेरे बड़े भाई से मिलने जा रहा हूँ जो वहां काम करता है और अकेला रहता है। 
उन्होंने पूछा  क्या चिट्ठी लिखी थी उसे कि तुम आ रहे हो, मैने कहा जी हाँ- तो क्या उसने जवाब दिया, मैने कहा नहीं- तो हो सकता है कि उसे चिट्ठी मिली ही न हो। मैने कहा शायद- कोई सेल फोन तो क्या साधारण फोन भी तो होते नहीं थे तब- पता भी किसे और कैसे चलता, कोई मिलेगा या नहीं।  
बहरहाल कब तकरीबन चार घंटे गुज़र गए पता नहीं चला और ट्रेन शाम को राजपुरा जा पहुंची। उतरकर उन्होंने कहा- क्या पता भाई मिले ना मिले, अकेला बंदा है कहीं गया भी हो सकता है, क्या करोगे, किसी को जानते हो क्या यहाँ- मैने कहा नहीं! उन्होंने एक कागज़ का पुर्जा मुझे दिया जिसमें उन्होंने अपना पता लिखा था कहा- अगर भाई नहीं मिले तो मेरे घर आ जाना। अब मेरी अजनबियों के साथ वाली ट्रेनिंग ने कहीं थोड़ा जोर मारा, और मेरी आँखों में उतर आया शंका का भाव उन अनुभवी आंखों ने सहज ही पढ़ लिया। मेरे सिर पे हाथ रख के थपथपाते बोले, बच्चे माहौल बहुत खराब चल रहा है, रात को मुश्किल होगी।  उन दिनों खालिस्तानी आतंकवाद पूरे चरम पर था- शाम होते ही पंजाब के अनेक इलाकों में कर्फ़्यू जैसी स्थिति हो जाती थी पर इसका अंदाज़ दिल्ली में रहकर नहीं चलता था। टीवी सहित सँचार के माध्यम आज जैसे तो थे ही नहीं। जो अखबार में होता था वही मालूम होता था। ब्रैकिंग न्यूज़ का चलन तो अब हुआ है जो कुछ नहीं होने पे भी बहुत कुछ हुआ ऐसा बात देती है। 

मैं भी चलते फिरते भाई के कंपनी गेस्ट हाउस पहुंचा और जैसी दारजी की शंका थी वैसा ही हुआ, भाई काम के सिलसिले में कहीं बाहर गया हुआ था, गेस्ट हाउस में भी जगह नहीं मिली, और छोटे से कस्बे राजपुरा में शाम को ढूंढ के भी होटल नहीं मिला। अंधेरा होते होते सारा शहर बन्द,  बिल्कुल कर्फ़्यू जैसा माहौल, कोई बंदा दूर दूर तक नजर नहीं आ रहा था। 
अब मन में थोड़ी घबराहट होने लगी, मैं भले ही बिन्दास और बेबाक था पर था तो स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा ही, दुनिया घूम लेता था पर दुनियादारी से बिल्कुल बेखबर अल्हड़ मन ही था, ऐसी किसी असहज स्थिति से कभी रूबरू नहीं हुआ था पहले। 
जेब में हाथ डाल के टटोला और दारजी का पर्चा  अपनी जगह पर पाके मन को बड़ा हौसला मिला, सोचा चलो ये भी सही। 
कुछ देर सड़क पर ढूँढने के बाद एक बिहारी रिक्शेवाला भाई मिला,  बोला ये कोई वक्त है बाबू, आजकल बाहर घूमने का, माहौल कितना खराब है!  अब क्या समझाता उसको, बस कहा, भैया इस पते पर ले चलो। 
भटकते भटकते कस्बे के बाहर एक कोने में आख़िर दारजी का पता मिल ही गया। शाम के साड़े आठ ही बजे थे  पर छोटा कस्बा और डर का माहौल, सारा इलाका जैसे सांय-सांय कर रहा था।
कुण्डी खटकाने के पहले ही दारजी ने दरवाजा खोल दिया, शायद उन्हें पहले से ही अहसास था कि मैं आने वाला हूँ, इंतज़ार में बैठे थे वो। और शायद इसीलिए मुझसे इतने सवाल जवाब उन्होंने सफर के दौरान मुझसे किये थे और अपना पता भी दिया था।
दार जी और बेबे दो ही लोग थे घर में,  साधारण सा घर, बढ़ई का काम था उनका। बेबे ने गरम रोटी पकाई, प्यार से खिलाई, फिर दोनों ने हौसला देते हुए मुझे सुला दिया। 
सुबह जल्दी ही नाश्ता करके मैने विदा ली, दार जी ने फिर सर पे प्यार से हाथ रखा और कहा कि पहुँच के चिट्ठी लिख देना, माहौल बड़ा खराब है, हमें पता चल जाएगा कि तुम सलामत पहुँच गए हो।
 मैं दिल्ली की ट्रेन पकड़ वापस पहुँच गया, अल्हड़ मन और चिठ्ठी लिखने में सदा का आलस, आजकल आजकल करते तीन दशक से ऊपर हो गए न कभी राजपुरा जाना हुआ और नाही वो चिठ्ठी कभी लिखी गयी। इतने वर्षों बाद आज फिर वहां से गुज़रा तो शहर में तो कुछ भी पहचानने जैसा नहीं लगा, सब कुछ बदल गया जिंदगी और विकास की दौड़ में  पर उस अधूरी कहानी के पन्ने मुझे याद दिलाने लगे दारजी और बेबे की। 
सिर झुका के दोनों के लिए प्रार्थना की के दोनों जहाँ भी हों सुकून में हों और चल पड़ा हूँ किसी और अधूरी कहानी के पन्ने तलाशते हुए! 
अन्वेषक।